पंचाचुली ट्रैक डायरी (2026) – मेरी दारमा घाटी की अविस्मरणीय यात्रा

हर यात्रा एक कहानी होती है, लेकिन कुछ यात्राएँ ऐसी होती हैं जो जीवन का हिस्सा बन जाती हैं। वे केवल नक्शे पर तय की गई दूरियाँ नहीं होतीं, बल्कि यादों, अनुभवों और भावनाओं का ऐसा खज़ाना होती हैं जो जीवनभर साथ चलता है। पंचाचूली बेस कैंप ट्रेक मेरे लिए भी ऐसी ही एक अविस्मरणीय यात्रा रही। यह हमारा कुमाऊं दर्शन का तीसरा अध्‍याय है- पहला – पाताल भुवनेश्‍वर तक मोटरसाइकिल राइड (2023), दूसरा – पिंडारी ग्‍लेशियर जीरो प्‍वाइंट का रोमांचक अनुभव (2024) और इस बार पंचाचुली जीरो प्‍वाइंट तक ट्रेकिंग (2026)।

यात्रा केवल एक ट्रेक (मंजिल) नहीं होती

हिमालय का आकर्षण मुझे हमेशा अपनी ओर खींचता रहा है। ऊँचे-ऊँचे पर्वत, बर्फ से ढकी चोटियाँ, गहरी घाटियाँ, हिमनदों से निकलती नदियाँ और प्रकृति की वह अद्भुत नीरवता, जिसे शब्दों में बाँध पाना आसान नहीं। मुझे प्रकृति के करीब रहना पसंद है और प्रकृति से अपने प्रेम के चलते अपना शहरी सुख सुविधाओं वाला जीवन त्‍याग दिया और अपने पैतृक गांव वापिस आ गया इसे आप रिवर्स माइग्रेशन कह सकते हैं। अक्‍सर ऐसा होता है कि शहर के लोग सुकून पाने के लिए पहाड़ों की ओर भागते हैं और पहाड में रहने वाले लोग शहरों की ओर, किन्‍तु मेरा नियम अलग है, मैं प्रकृति के और करीब जाता हूं।

मेरे लिए कोई भी यात्रा केवल एक ट्रेक (मंजिल) नहीं होती। यह स्वयं से मिलने, अपनी सीमाओं को परखने और हिमालय की विराटता के सामने अपने अस्तित्व को महसूस करने का अवसर होती है। कभी हरे-भरे मखमली घास से ढके तो कभी कई फीट बर्फ से लदे बुग्‍यालों से होकर गुजरते रास्ते मिलते हैं, कभी उफनती नदी की गर्जना हमारा स्वागत करती है। कहीं झरनों की मधुर धुन तो कहीं बर्फीली हवाओं की सिहरन। हर मोड़ पर प्रकृति अपना नया रूप दिखाती है और हर कदम यह एहसास कराता है कि हिमालय केवल देखा नहीं जाता, उसे महसूस किया जाता है।

इस ट्रैवल डायरी में मैं केवल रास्तों का विवरण नहीं दे रहा हूँ। मैं उन पलों को संजोने का प्रयास कर रहा हूँ जिन्हें मैंने जिया—सुबह की पहली किरण के साथ शुरू होने वाली पदयात्राएँ, थके हुए कदमों में भी मंज़िल तक पहुँचने का उत्साह, साथियों के साथ बिताए अनमोल क्षण, स्थानीय लोगों की आत्मीय मुस्कान और पंचाचूली की हिमाच्छादित चोटियों को पहली बार सामने देखकर मन में उमड़ी वह अवर्णनीय अनुभूति।

यदि आप भी हिमालय से प्रेम करते हैं, रोमांच को जीना चाहते हैं या कभी पंचाचूली बेस कैंप जाने का सपना देखते हैं, तो आइए मेरे साथ इस यात्रा पर चलिए। यह केवल एक ट्रेक की कहानी नहीं, बल्कि उन रास्तों की दास्तान है जहाँ हर मोड़ पर प्रकृति एक नया अध्याय लिखती है और हर कदम जीवन को एक नया अर्थ दे जाता है।

सबसे पहले मैं अपने साथियों से परिचय कराता चलूं। इस बार मेरे ग्रुप में प्रेम, संजय (अज्‍जू) उसका छोटा भाई सूरज, हैप्‍पी और जगदीप (बब्‍बू) थे। मैं और जगदीप (बब्‍बू) गांव में रहते हैं जबकि प्रेम ओमान, हैप्‍पी भी दुबई रिटर्न है और आजाद सऊदी में नौकरी करते हैं ज‍बकि सूरज पहले अमेरिका में रहता था लेकिन अब गाजियाबाद रहता है। मेरा और बब्‍बू का तो जीवन ही ट्रेकिंग है। बाकी लोग बाहर रहते हैं लेकिन प्रेम का परिवार गांव में रहता है जिससे उसका गांव आना-जाना लगा रहता है। प्रेम रिखोला और मैने पहले भी कई ट्रेक किये हैं हमने अपना पहला ट्रेक श्री बद्रीनाथ क्‍वारी पास 2012 में किया था। जबकि सूरज और बब्‍बू ने अपना पहला ट्रेक 2024 में पिंडारी ग्‍लेशियर किया था लेकिन अज्‍जू का यह पहला अनुभव था हालांकि वह हमारी 2023 की बीरोंखाल-पाताला भुवनेश्‍वर -पिथौडागढ़ मोटरसाइकिल एक्‍सपिडीशन का हिस्‍सा रह चुका है।

पंचाचुली ट्रैक का पहला और दूसरा दिन (बीरोंखाल से दान्‍तू गांव)

हम सभी करीब रात 10 बजे अपने गांव सिन्‍दूड़ी से चले और मैंठाणाघाट, रसियामहोदव, मानिला, चौखुटिया, मासी, सोमेश्‍वर होते हुए सुबह करीब 6 बजे बागेश्‍वर पहुंचे।

उत्तराखंड के कुमाऊँ मंडल में स्थित बागेश्वर सरयू और गोमती नदियों के पवित्र संगम पर बसा एक प्राचीन नगर है। समुद्र तल से लगभग 960 मीटर की ऊँचाई पर स्थित यह नगर धार्मिक आस्था, ऐतिहासिक महत्व और प्राकृतिक सौंदर्य का अनूठा संगम है।

बागेश्वर का प्रमुख आकर्षण बागनाथ मंदिर है, जिसका निर्माण 17वीं शताब्दी में चंद शासकों द्वारा कराया गया था। भगवान शिव को समर्पित यह मंदिर कुमाऊँ के सबसे महत्वपूर्ण शिवधामों में से एक माना जाता है। प्रत्येक वर्ष जनवरी में आयोजित उत्तरायणी मेला यहाँ की सांस्कृतिक पहचान है, जिसमें उत्तराखंड के विभिन्न क्षेत्रों से हजारों श्रद्धालु और पर्यटक पहुँचते हैं।

धार्मिक महत्व के साथ-साथ बागेश्वर साहसिक पर्यटन का भी प्रमुख केंद्र है। पिंडारी ग्लेशियर, कफनी ग्लेशियर, सुन्दरढूंगा घाटी और नामिक ग्लेशियर जैसे प्रसिद्ध ट्रेक यहीं से प्रारंभ होते हैं। इसी कारण इसे हिमालयी ट्रेकिंग अभियानों का प्रवेश द्वार भी कहा जाता है।

हम बागेश्‍वर शहर से आगे एक जगह पर नाश्‍ते के लिए रुके। नाश्‍ता करने के बाद असकोट, जौलजीबी होते हुए दोपहर करीब 1 बजे धारचुला पहुंचे।

धारचूला – भारत-नेपाल सीमा पर बसा हिमालय का प्रवेश द्वार

उत्तराखंड के पिथौरागढ़ जनपद में स्थित धारचूला काली (महाकाली) नदी के तट पर बसा एक सीमांत नगर है। समुद्र तल से लगभग 940 मीटर की ऊँचाई पर स्थित यह नगर भारत और नेपाल के बीच सांस्कृतिक, व्यापारिक और सामाजिक संबंधों का महत्वपूर्ण केंद्र है। काली नदी के पार नेपाल का धारचूला नगर स्थित है, और दोनों देशों को एक झूला पुल जोड़ता है।

धारचूला को दारमा, व्यास और चौंदास घाटियों का प्रवेश द्वार माना जाता है। यहीं से पंचाचूली बेस कैंप, ओम पर्वत, आदि कैलाश, नारायण आश्रम और कई प्रसिद्ध हिमालयी ट्रेकों की यात्रा प्रारंभ होती है। ट्रेकिंग दलों के लिए यह अंतिम बड़ा बाज़ार है, जहाँ से आवश्यक खाद्य सामग्री, ट्रेकिंग उपकरण, इनर लाइन पास/ परमिट, नकदी निकासी और अन्य जरूरी सामान की व्यवस्था की जाती है। किन्‍तु इतना महत्‍वपूर्ण स्‍थान होने के बाद भी यहां की स्थिति कुछ ठीक नहीं है, पूरा मार्केट एक संकरी सड़क के दोनों तरफ बसा हुआ है, सड़क इतनी संकरी है कि गाडियां एक ही दिशा में चलती है यानि आपको 10 मीटर के लिए पूरे मार्केट का चक्‍कर लगाकर आना पडता है।

यहां पहुंचने से पहले मैं सोच रहा था कि कम से कम बागेश्‍वर जैसा तो होगा ही लेकिन यह पहाड़ों में एक दूर-दराज जगह में पडने वाले मार्केट की तरह ही निकला जिससे बहुत निराशा हुई। किसी तरह गाड़ी खड़ी करने के बाद जब हम मार्केट में पहुंचे तो बहुत निराशा हुई यहां पर केवल ढाबे ही हैं जहां केवल सामान्‍य भोजन (दाल-चावल आदि) ही मिलता है, हमें केवल एक ठीक-ठाक रेस्‍टोरेंट मिला लेकिन वहां व्‍यवस्‍था ठीक नहीं थी इसलिए हमने सादा भोजन करना ही उचित समझा, जो बहुत ही बेस्‍वाद था। धारचूला के बाद केवल कैश ही चलता है क्‍योंकि इंटरनेट सेवाएं नहीं चलती है, नेटवर्क टॉवर तो हैं लेकिन वे केवल 2जी क्षमता वाले हैं यानि बात हो सकती है लेकिन इंटरनेट नहीं चलता है।

धारचूला से दुक्‍तू गॉंव की कठिन यात्रा

धारचूला से आगे यात्रा अत्‍यंत रोमांचक और खतरनाक हो जाती है। धारचूला से तवाघाट तक सड़क दो लेन की है लेकिन कहीं-कहीं पर सड़क बहुत ज्‍यादा क्षतिग्रस्‍त है। BRO लगातार काम करता रहता है लेकिन अत्‍यधिक खड़ी चट्टानों के कारण जरा सी हलचल इन चट्टानों को हिला देती है और ये भरभराकर गिर जाते हैं। तवाघाट पर दारमा नदी के ऊपर एक पुल है इस पुल से पहले बायीं ओर की सड़क दारमा घाटी की ओर जाती है जबकि पुल से आगे की सड़क ओम पर्वत, आदि कैलाश, नारायण आश्रम की ओर जाती है।

तवाघाट से हमारी गाड़ी दारमा घाटी की ओर मुड गयी, लेकिन जैसे-जैसे हम आगे बढ़ते जा रहे थे घाटी और संकरी होती जा रही थी, इतनी सीधी और खड़ी चट्टाने मैंने पहली बार विष्‍णु प्रयाग से ब्रदीनाथ की ओर जाते हुए देखी थी। BRO की प्रशंसा करनी होगी कि उन्‍होंने इतने दुर्गम चटृटानों को काटकर इतनी बेहतर सड़क बनायी लेकिन कहीं-कहीं पर चट्टाने खिसकने और बादल फटने के कारण सड़क गायब हो जाती है, इसी तरह आगे बढ़ते हुए हम सोबला गांव पहुंचे यह एक छोटा सा गांव है। लगातार 18 घंटे की यात्रा के कारण सभी की बैठने की क्षमता जवाब देने लगी थी इसलिए बार-बार मील के पत्‍थरों पर कम होते किलोमीटर्स को देखे जा रहे थे लेकिन यह कम होने की बजाय बढ़ते ही जा रहे थे, जिससे भी पूछते वह यही कहता अभी समय लगेगा।

कई किलोमीटर्स चढ़ने के बाद हम दार गांव पहुंचे यह घाटी का पहला प्रमुख पारंपरिक रं (शौका) गाँव है, हम दार में चाय पीने के लिए रुक गये, हल्‍की-फुल्‍की बारिश हो रही थी, यहां दो-तीन छोटी-छोटी दुकानें हैं, हमने चाय का ऑर्डर देने से पहले दुकानदार से यही पूछा कि भाई और कितना टाइम लगेगा दुग्‍तू/ दुक्‍तू पहुंचने में, तो उसने भी वही जवाब दिया – “अभी तो एक 1-2 घंटा लगेगा सर”! यह बहुत संवेदनशील सड़क है इसलिए इस पर हमेशा काम चलता रहता है।

प्रकृति का पहला सबक

चाय पीने के बाद हम आगे बढ़े, अब सड़क ऊपर की ओर चढ़ती ही जा रही थी, दार गांव से करीब 10 किमी ऊपर चढ़े होंगे तभी हमें कार दिखी, महिला कार की बगल में खड़ी थी, उनका सामान गाड़ी से बाहर रखा हुआ था और कार के बायीं ओर के दोनों टायर नाली में झूल रहे थे। हालात समझने में हमें देर नहीं लगी क्‍योंकि सामने एकदम खडी चढ़ाई थी, हल्‍की-हल्‍की बारिश हो रही थी जिसके कारण मिट्टी गीली हो गयी थी। कार चढ़ नहीं पायी और खिसकर नाली में आ गयी। हमने सोचा पहले अपनी कार को उस चढ़ाई के पार खड़ी करके आते हैं फिर इन लोगों की सहायता करेंगे, लेकिन जैसे ही कार को ऊपर की ओर चढ़ाया वह भी एक ही जगह पर रेंगने लगी, बहुत कोशिश करने के बाद कार बड़ी मुश्किल से पार हो गयी।

कार को खड़ी करने के बाद जैसे ही हम उन लोगों के पास आये तो ड्राइवर साहब पिछले टायर में जैक लगाकर निकालने की कोशिश कर रहे थे, लेकिन वहां ठोस जगह न होने के कारण जैक लगाना संभव नहीं था। “भाई, कार को एक साइड से उठाते हैं और उसके नीचे बडे पत्‍थरों को डालते हैं” मैंने सुझाव दिया। हम 6 लोग थे, तभी दो मोटरसाइकिल सवार भी आ गये, हमने उन्‍हें भी रोका तो वे रुक गये। अज्‍जू को ड्राइवर सीट पर बिठाया, सभी ने जोर लगाते हुए कार को बायीं तरफ से उठाया और धीरे-धीरे पत्‍थर लगाते हुए नाली से बाहर निकाल लिया लेकिन जैसे भी कार को ऊपर चढ़ाने की कोशिश की उसके अगले टायरों ने जवाब दे दिया, जैसे-जैसे अज्‍जू एक्‍सीलरेटर दबाता टायर आगे बढ़ने की बजाय पीछे की ओर खिसकने लगते। अब आधे लोगों को पीछे से धक्‍का लगाने को कहा, जैसे ही कार थोड़ी आगे बढ़ती कुछ लोग टायर के पीछे बड़ा सा पत्‍थर रख देते और बड़ी मुश्किल से कार को हम लोगों ने वहां से निकाला। बारिश से ढलान की मिट्टी गीली होने और कार फ्रंट व्‍हील ड्राइव होने के कारण कार आगे बढ़ने की बजाय नीचे की ओर खिसक रही थी, ऊपर से टायरों के एक ही जगह पर घूमने के कारण पूरी मिट्टी और कंकड़-पत्‍थर पीछे हमारे ऊपर गिर रहे थे।

कार के सुरक्षित ढंग से निकलने के बाद दोनों सवारियों की जान में जान आयी, उनका धन्‍यवाद लेने के बाद हम थोड़ी देर के लिए वहीं पर रुक गये। हमारी गाड़ी जैसे-जैसे ऊपर चढती गयी, वैसे-वैसे हमारे ऊपर गिरने को आतुर शिखर नर्म पडने लगे, अब घास के मैदान, गांव, मोबाइल टावर दिखने लगे और सड़क भी घाटी की समान बेरहम नहीं थी। सेला और बालिंग पार करते हुए थोड़ी ही देर में हम दुगतू गांव के मुहाने पर पहुंच गये, शाम के लगभग 7 बजे थे, दुगतू में बड़ी चहल-पहल थी, जून का आखिरी हफ्ता था मगर वहां काफी भीड-भाड थी, रहने की जगह सीमित थी, जो अब फुल हो चुकी थी।

पहाड़ों में बढ़ती भीड़ और व्‍यवसायीकरण

हमारा लक्ष्‍य तो दान्‍तू गांव था जो दुगतू/दुक्‍तू के ठीक सामने था, दान्‍तू गांव में कुछ रिसोर्ट बने हुए हैं जो रोशनी से जगमगा रहे थे। जैसे ही हम आगे बढ़े एक आदमी हमारे पास आया और बोला – सर, सभी गेस्‍ट हाउस, होम स्‍टे फुल हो गये हैं, लेकिन मैं व्‍यवस्‍था कर सकता हूं” – हमने पूछा – “भाई, क्‍या रेट है”! उसने कहा – एक आदमी का एक रात का रु. 3500 इसमें आपको डिनर और ब्रेकफास्‍ट मिलेगा। उसकी बात सुनकर हम चौंक गये – हमने कहा – भाई हमारी पहले से बुकिंग है दान्‍तू में, इतना कहकर हम आगे बढ़ गये। पुल पार करने के बाद दान्‍तु शुरु हो जाता है वहीं पर एक रिसोर्ट था, उससे पता किया तो उसने रु.2500 प्रति व्‍यक्ति बताया। हम और आगे बढ़े बायीं ओर सड़क के ऊपर एक नया रिसोर्ट बना हुआ है, उसने कहा कमरे उपलब्‍ध नहीं है, उसने एक छोटा कमरा दिखाया जो हमारे लिये पर्याप्‍त नहीं था। हम नीचे आ गये, आगे बढ़े तो मोड पर नीचे की ओर भी एक रिसोर्ट बना है लेकिन वहां भी कमरे नहीं थे।

रात के लगभग 8 बज गये थे और हम पिछले 20 घंटे से लगातार यात्रा कर रहे थे, थकान के कारण बुरा हाल था, ऊपर से ठहरने की जगह नहीं थी, मूड खराब हो गया था। कुछ देर में अज्‍जू ने आकर कहा – भाईयो, एक कमरा है जिसमें हम सभी 6 लोग एक साथ रह सकते हैं लेकिन एक आदमी का किराया रु.2000 है जिसमें डिनर और ब्रेक फास्‍ट मिलेगा और सुबह 11 बजे से पहले कमरा खाली करना होगा। हमने ज्‍यादा नहीं सोचा क्‍योंकि और भी टूरिस्‍ट पहुंचने लगे थे और सड़क पर भीड़ जमा हो गयी थी, होटल फुल थे और रेट ज्‍यादा। हमने चुपचाप अपना सामान उठाया और चेक इन कर लिया।

रिसोर्ट पूरी तरह से लकड़ी से बना हुआ है, जो प्रीमियम एहसास कराता है, य‍ह कमरा भी नहीं मिलता तो शायद रात गाड़ी में ही गुजारनी पड़ती। मौसम की बात करुं तो यह उतना ठंडा नहीं था जितना हमने सोचा था, अपने गांव जैसा ही था। लगातार यात्रा करने के कारण सभी लोग बहुत ज्‍यादा थके हुए थे, कमर में दर्द हो रहा था। सभी ने खाना खाया और जल्‍दी ही सो गये।

यात्रा को तीसरा दिन (दुक्‍तू गॉंव से पंचाचूली जीरो प्‍वाइंट और जौलजीबी तक)

लगभग 5 बजे मेरी नींद खुली और उठकर बालकनी में आया तो आज मौसम खराब था घाटी में बादल छाये हुए थे कुछ दिखायी नहीं देता था यह देखने के बाद मेरा मन निराशा से भर उठा। कुछ देर बाद बादल हल्‍के से छंटे तो पंचाचुली पर्वत श्रृंखला के दर्शन हुए, तीन चोटियां दिखायी दी लेकिन पूरी तरह नहीं। बारिश की संभावना लग रही थी। मैं अंदर आ गया और फ्रैश होकर दोबारा बालकनी में आया, सुबह के लगभग 6 बजे होंगे, तो मुझे सामने दुगतू/दुक्‍तू गांव से शुरु होने वाले पंचाचुली ट्रेक मार्ग पर कुछ लोग जाते हुए दिखायी दिये। मैंने तुरंत सभी को उठाना शुरु किया कि चलो जल्‍दी चलते हैं लोगों ने ट्रेकिंग शुरु कर दी है, बारिश हो गयी तो कुछ नहीं दिखेगा और 10 बजे के बाद तो वैसे भी ऊंची चोटियां बादलों से ढकने लगती है।

हमेशा याद रखें कि, जब भी आप हिमालय की चोटियों को देखने जायें तो कोशिश करें कि सूर्वोदय से पहले व्‍यू प्‍वाइंट पर पहुंच जायें, इस समय इन चोटियों को निहारने का अनुभव अनमोल होता है। सूरज की पहली किरण सफेद बर्फ को सोने का बना देती है लेकिन जैसे-जैसे सूरज चढ़ता है, चोटियों की बर्फ से भाप बनने लगती है जो धीरे-धीरे बादल का रुप ले लेती है और चोटियों को ढक लेती है जिससे मजा किरकिरा हो जाता है।

किसी तरह से हमने होटल वाले को ढूंढा और उससे चाय-नाश्‍ता तैयार करने को कहा। 1 घंटा इंतजार करने के बाद उसने नाश्‍ता करने के लिए बुलाया, उसने पराठे और चाय बनायी थी। आप यकीन नहीं करेंगे कि उसने हमें केवल 1-1 पराठा ही दिया, पूछने पर बोला,1-1 ही बोला गया था और चाहिए तो समय लगेगा। हमारे पास समय नहीं था क्‍योंकि हमें समिट करने के बाद वापिस भी जाना था।

हम सभी ने उसे अच्‍छी-अच्‍छी गालियां देते हुए अपना सामान गाड़ी में रखा और दुगतू/ दुक्‍तू आ गये। सड़क किनारे गाड़ी खड़ी करने के बाद हमने चढ़ाई शुरु कर दी। कई और भी जेन-जी हमारे साथ चल रहे थे लेकिन उन्‍हें शायद इस जगह की खूबसूरती और हिमालय से कुछ लेना-देना नहीं था, वास्‍तव में वे तो ट्रेकर्स थे ही नहीं वे बस सोशल मीडिया कंटेन्‍ट बनाने और एंजॉय करने के लिए आये थे।

वे बहुत धीरे-धीरे और ब्‍लूटूथ स्‍पीकर्स पर तेज आवाज में गाने सुनते हुए जा रहे थे। उन्‍हें प्रकृति के संगीत से कोई लेना-देना नहीं था खैर, मेरी एक खराब आदत है जब मैं चलना शुरु करता हूं तो मैं बैठता नहीं हूं बस चलता ही चला जाता हूं, मेरे साथी पीछे छूटने लगे थे, मैं आगे बढ़ता चला जा रहा था और बाकी लोग पीछे छूटते जा रहे थे। आगे जाने पर मैंने पानी की टंकी के पास एक बोर्ड देखा जिसपर तीन रास्‍तों के संकेत बने हुए थे, दो दाईं ओर जाते थे ऊपर वाले तीर के निशान पर लिखा था “पंचाचुली व्‍यूप्‍वाइंट ट्रेक मार्ग, आप इस मार्ग से ट्रेक करें” जबकि उससे नीचे बने तीर के निशान के सामने लिखा था “इस मार्ग से जाना प्रतिबंधित (जाना मना) है” और एक तीर बायीं ओर इशारा कर रहा था जिस पर लिखा था “रंज्‍यागति ताल”। तभी मुझे ऊपर से तीन लोग लकडी के गट्ठर पीठ पर लादकर आते हुए दिखा। मैंने उनसे पूछा – “दाजू, कौन सा रास्‍ता ठीक रहेगा” उनमें से सबसे पीछे चल रहे व्‍यक्ति ने बिना मेरी ओर देखे बिना कहा – “ऊपर वाले रास्‍ते से जाना”। मैं आगे बढ़ने लगा, चढ़ाई अब लगभग खत्‍म हो गयी थी, सामने पंचाचुली पर्वतमाला दिखायी देने लगी थी, जो मुझे अपनी ओर आकर्षित कर रही थी।

अब तक मैं लगभग 1-2 किलोमीटर की दूरी तय कर चुका था। रास्‍ता अब सीधा-सीधा था, उतार-चढ़ाव बहुत कम थे। मैं आगे बढ़ता जा रहा था और बडे पेड़ गायब होने लगे थे जिससे घाटी दूर तक दिखायी दे रही थी, एकदम निर्जन और शांत बस नीचे बहती दारमा नदी की कल-कल सुनाई देती थी। मैंने सुबह लोगों को सुबह-सुबह इस ओर आते देखा था लेकिन घाटी में कोई नहीं था, मैंने सोचा आगे लोग मिल जायेंगे, जैसे ही मैंने एक घाटी पार की तो दूसरी शुरु हो गयी, अब तो बस तो सामने का नजारा और भी शानदार हो चला था, पंचाचुली की चोटियां साफ-साफ दिखायी दे रही थी, मेरे आस-पास केवल घास के बुग्‍याल थे, एक जगह पर बकरवालों की झोपड़ी थी, वहां भेड़ों की बहुत सारी ऊन इधर-उधर बिखरी हुई थी।

रास्‍ते में छोटी-छोटी बुरांस की झाडि़यां थी, बड़े पेड़ लगभग गायब हो चुके थे। इतनी खुली जगह में मैं अकेला था, सच कहूं तो मुझे डर लगने लगा था, मैंने सोचा, अगर भालू आ गया तो खेल खत्‍म समझो, मैंने पीछे मुड़ कर देखा तो मेरे साथ चल रहे ट्रेकर्स का दूर-दूर तक कोई अता-पता नहीं था। 1 घंटे से मैं लगातार चलता ही जा रहा था, एक घाटी पार करने के बाद दूसरी घाटी और फिर तीसरी। अब मैं उस मुहाने पर पहुंच गया था जहां पर दूसरा प्रतिबंधित रास्‍ता मिलता है, यह एक पर्वतों की तलहटी थी, जिसमें ऊपर से छोटी-छोटी पानी की धारायें मिल रही थी और इसे छोटी सी नदी का स्‍वरुप दे रही थी।

जीरों प्‍वाइंट का रास्‍ता इसी तलहटी से होकर जाता है, यहां से चढ़ाई शुरु हो गयी थी, जैसे-जैसे ऊंचाई बढ़ती जा रही थी सांस फूल रही थी। मैंने सुबह 8 बजे चलना शुरु किया था और 9.30 बज रहे थे, मैंने एक भी ब्रेक नहीं लिया था। मैं थोड़ा और आगे बढ़ा तो मुझे जीरो प्‍वाइंट पर कुछ हरकत दिखी, मैं अभी भी बहुत दूर था लेकिन मैं समझ गया कि मंजिल अब दूर नहीं है। मैं एक चढ़ाई चढ़ता तो दूसरी शुरु हो जाती, ऐसा लगता कि बस पहुचने ही वाला हूं लेकिन फिर से एक और चढ़ाई शुरु हो जाती। रास्‍ता इतना सुंदर मानों स्‍वर्ग जाने का रास्‍ता हो, कम से कम मुझे तो ऐसा ही महसूस हो रहा था।

पंचाचुली जीरो प्‍वाइंट का अनुभव

अंतत: मैं उन लोगों के पास पहुंच ही गया जिनके मुझे अक्‍स दिखायी देते थे, वो 4 लड़के थे तो सबसे पहले वहां पहुचे थे, मैंने उनसे पूछा यही जीरो प्‍वाइंट है तो, उनसे से एक लड़के ने ऊपर की ओर इशारा करते हुए कहा – “सर! लास्‍ट प्‍वाइंट वहां पर है, लेकिन वहां से भी कुछ खास नहीं दिखता है, आप जाना चाहो तो जा सकते हो”। मैंने जवाब दिया – भाई लोग, अब यहां तक आ ही गया हूं तो 200 मीटर और चलने में क्‍या हर्ज है, और मैंने चढ़ाई शुरु कर दी, कुछ ही देर में मैं टॉप पर था। वहां पर एक लड़का पहले से मौजूद था, मैंने वहां बने पत्‍थर के पिरामिड पर एक पत्‍थर रखा, जो यहां तक पहुंचने की निशानी है और सामने की चट्टान पर अपना नाम और गांव का नाम भी लिख दिया ताकि प्रकृति मुझे याद रखे।

मैं चोटी के मुहाने पर पहुंचा और जैसे ही मैंने नीचे देखा तो मेरे होश उड़ गये, ग्‍लेशियर का नामो-निशान नहीं, इस पार से उस पार तक का कई सौ मीटर की जमीन गायब थी, अब वहां गहरी खाई थी और जिस स्‍थान पर मैं खड़ा था वहां पर भी बड़ी-बड़ी दरारें आयी हुई थीं, न जाने कब यह हिस्‍सा भी कट जायेगा। चट्टाने नग्‍न थी, बर्फ केवल शिखर पर थी। बर्फ तेजी से पिघल रही थी जिससे ऊंचे-ऊंचे झरने गिर रहे थे। शिखर पर बादलों का डेरा था, कुछ भी साफ नहीं दिख रहा था।

मैंने घड़ी में देखा तो ठीक 10 बज रहे थे, यानि मैंने लगभग 5 किमी. का ट्रेक 2 घंटे में पूरा कर लिया था। मेरी बगल में एक लड़का हाथ में बाइक हेलमेट पकड़े खडा था, मैंने उससे गुजारिश की – “भाई मेरी फोटो खीच दो प्‍लीज’’ । उसने मेरे कुछ फोटो खीचें जो बिल्‍कुल भी अच्‍छे नहीं आये क्‍योंकि धुंध और बादलों के कारण रोशनी कम थी। थोड़ी देर तक पंचाचुली पर्वतमाला की दुर्दशा देखता रहा, जीरों प्‍वाइंट पर पहुंचकर मुझे बिल्‍कुल भी खुशी नहीं हो रही थी, जलवायु परिवर्तन ने ग्‍लेशियरों को निगलना शुरु कर दिया है। मैंने यही हाल पिंडारी ग्‍लेशियर का भी देखा लेकिन वहां हमें फुरकिया से ही बर्फ में चलने का आनंद मिला था जबकि पंचाचुली का हाल तो दयनीय है। जीरों प्‍वाइंट पर बिल्‍कुल भी बर्फ नहीं थी बस आस-पास चौड़ी होती दरारें नजर आ रही थी।

मैं अभी भी सोच में डूबा था तभी मेरा ध्‍यान टूटा – मेरे साथ में खड़ा लड़का चिल्‍लाया “अरे भाई बस कर अब नीचे आ जा” मैंने ऊपर देखा तो उसका दोस्‍त खड़े पहाड़ पर चढ़ रहा है, बहुत ऊपर थोड़ी सी बर्फ उसे दिखायी दी वह उसे देखने के लिए बहुत ही खड़ी ढलान वाली पहाड़ी पर चढ़ता चला जा रहा था, मैंने मन ही मन सोचा – अगर उसका पैरा जरा भी फिसला तो वह सीधे कई सौ फीट गहरी खाई में गिरेगा और राम-नाम सत्। हम जितना उसे नीचे उतरने के लिए कहते वह और ऊपर चढ़ता जा रहा था। पूछने पर पता चला वे दोनों बागेश्‍वर में रहते हैं। उसने हमारी एक नहीं सुनी – उसका दोस्‍त उसे कह रहा था – भाई नीचे आ जा, ये आर्मी वाले हैं, ये मुझे अपने साथ ले जा रहे हैं। मैंने सोचा यह ऐसा क्‍यों कह रहा है – फिर मुझे याद आया मैंने आर्मी कैप पहनी हुई थी, शायद उसे लगा मैं आर्मी में हूं। वह इतना ऊपर पहुंच गया था कि हमारी आवाज भी उस तक नहीं पहुंच रही थी।

आधा घंटा बीत चुका था लेकिन वह सिरफिरा नीचे आने का नाम नहीं ले रहा था, आखिर में मैंने कहा – हम ऐसा करते हैं, नीचे जाने का नाटक करते हैं, शायद बात बन जाये, लेकिन नहीं फिर भी वह चढ़ता ही जा रहा था, अब वह इतनी खतरनाक जगह पर पहुंच गया था कि खाई देखकर यदि उसका सिर चकरा गया तो खेल खत्‍म ही समझो।
हमने उसे बहुत समझाया, अब तो इशारे और सीटिंयों की आवाज ही उस तक पहुंच रही थी। थोड़ी देर में अचानक वह नीचे की ओर सरकने लगा जिससे हमारी चिंता और बढ़ गयी क्‍योंकि उतरते वक्‍त यदि उसने संतुलन खोया तो वह तलहटी में जाकर ही रुकेगा। जब वह सुरक्षित दूरी तक पहुंच गया तो, मैंने नीचे उतरने का फैसला किया और कुछ ही देर में मैं नीचे वाले व्‍यू प्‍वाइंट पर आ पहुंचा।

11 बजे चुके थे लेकिन मेरे साथियों और अन्‍य लोगों का कोई अता-पता नहीं थी, व्‍यू प्‍वाइंट पर चारों लके अभी भी फोटो खींचने और एंजॉय करने में व्‍यस्‍त थे। मैने उनसे पूछा – “भाई लोग! सुबह-सुबह मुझे दुगतू से कई लोग ऊपर की ओर जाते दिखे थे लेकिन यहां तो आप लोग ही हो बाकी लोग कहां चले गये”। उन्‍होंने बताया – वो गांव के लोग थे जो लकड़ी लेने गये थे, इसीलिए मुझे रास्‍ते में कोई नहीं मिला। थोड़ी देर में वे चारों भी लौट गये अब मैं अकेला ही था, मैं इंतजार करता रहा, एक बार तो मैंने सोचा कि हमेशा की तरह आज भी वे आधे से ही लौट गये होंगे इसलिए वापिस चलता हूं लेकिन करीब 11.30 बजे मुझे बहुत सारे लोग नीचे तलहटी में दिखायी दिये उनके साथ मेरे साथी भी थे। सबसे आगे बब्‍बू चल रहा था उसके बाद प्रेम और अज्‍जू फिर हैप्‍पी और सबसे आखिर में सूरज था। अब उन लोगों का आना व्‍यर्थ ही था क्‍योंकि पर्वतमाला पूरी तरह बादलों से ढक गयी थी और हल्‍की-हल्‍की बारिश भी शुरु हो गयी थी।

प्रतिबंधित रास्‍ता

कुछ ही समय में हम सभी एक साथ थे, अज्‍जू और हैप्‍पी जीरों प्‍वाइंट तक चले गये बाकी तीन वहीं घास में लेट गये, क्‍योकि उनके लिए यहां तक पहुंचना ही सबसे बड़ी उपलब्धि थी। लगभग 12 बजे हमने नीचे उतरना शुरु किया, जब हम तलहटी में उस जगह पहुंचे जहां प्रतिबंधित रास्‍ता ऊपर वाले रास्‍ते से मिलता है तो मैंने देखा लगभग सभी टूरिस्‍ट इसी प्रतिबंधित रास्‍ते से आ रहे हैं, जिस रास्‍ते मैं आया वहां से बहुत ही कम लोग आ रहे थे। हमने भी प्रतिबंधित रास्‍ते से वापिस आने का निर्णय लिया। जैसे-जैसे हम आगे बढ़ते गये तो देखा लोग पूरे परिवार, छोटे-छोटे बच्‍चों के साथ, स्‍कूली बच्‍चे सभी रास्‍ते लगे हुए थे। पूछने पर सभी ने बताया कि पंचाचुली जा रहे हैं। 5-10 साल की उम्र के बच्‍चे भी आराम से चढ़ रहे थे। मुझे तो यह लोकल पिकनिक स्‍पॉट लग रहा था अब मैं समझ गया था कि इस जगह की ऐसी दुर्दशा क्‍यों है। आगे बढ़ने पर हमें कुछ डोम टेन्‍ट्स दिखायी दिये जो कुमाऊं मंडल विकास निगम (KMVN) द्वारा बनाये गये थे, लेकिन उनकी हालत देखकर लगता था कि शायद उनमें कोई रहा हो, दरवाजे टूटे हुए थे दीवारों पर लोगों ने अपने-अपने नाम, अपनी प्रेमिका के नाम संदेश, आई लव यू ….. इत्‍यादि लिखे हुए थे। पूरी जगह तहस-नहस की गयी थी। लाखों रुपये के फाइबर से बने डोम टेन्‍ट्स अपनी बरबादी की दास्‍तां बयां कर रहे थे।

हमें रास्‍ते में और भी परिवार, ग्रुप्‍स, स्‍कूली बच्‍चे ऊपर जाते मिले, मतलब अब रास्‍ते पर बहुत भीड़-भाड़ हो गयी थी। कुछ देर बाद हम साइन बोर्ड वाली जगह पर पहुंच गये वहां पर टंकी बनी हुई थी जिसमें पाइपलाइन के जरिए पहाड़ों का ठंडा पानी गिर रहा था, पानी बहुत ही ठंडा था, सभी ने हाथ-मुंह धोया और दुगतू की तरफ बढने लगे, गांव से ठीक ऊपर पहुंचकर हम शॉर्टकट लेकर गाड़ी के पास जा रहे थे तभी नीचे से हमें किसी ने आवाज लगायी – “वहां से मत जाओ, इधर से आओ”। हमने नीचे देखा तो खेतों के बीचों बीच एक जगह पर बहुत सारे गांव वाले मौजूद थे और वहां पूजा-पाठ चल रहा था, तो हमने सोचा शायद इसीलिए हमें वहां से जाने के लिए मना कर रहे हों।

जैसे ही हम नीचे आये तो देखा तो वह एक वन चौकी थी जहां पर सभी टूरिस्‍टों को एंट्री करनी होती है और ट्रेकिंग रमार्ग के रखरखाव के लिए प्रति रु.50 के हिसाब से शुल्‍क देना होता है। जैसे ही हम सड़क पहुंचे अज्‍जू गाड़ी लेकर आ गया और हम मार्केट की ओर बढ़ गये, मार्केट के नाम पर 2-3 तीन दुकाने हैं वो भी केवल स्‍नैक्‍स बनाते हैं। हमें तो भूख लगी थी लेकिन खाने को केवल नूडल्‍स ही थे हमने नूडल्‍स और बिस्‍कुट, चिप्‍स न जाने-जाने क्‍या-क्‍या खाया लेकिन भूख नहीं मिटी।

दुक्तू/दुगतू गांव की एक झलक

पहाड़ों की तलहटी पर समतल जगह पर बसा दुक्तू गांव दारमा घाटी के पारंपरिक रं (शौका/भोटिया) समुदाय का गाँव है। कभी यह समुदाय तिब्बत के साथ ऊन, नमक और अन्य वस्तुओं का व्यापार करता था। 1962 के भारत-चीन युद्ध के बाद सीमावर्ती व्यापार बंद होने पर लोगों ने कृषि, पशुपालन और अब पर्यटन एवं होमस्टे को आजीविका का प्रमुख साधन बना लिया। आज भी यहाँ के पत्थर और लकड़ी से बने पारंपरिक घर, स्थानीय वेशभूषा और सरल जीवनशैली हिमालयी संस्कृति की जीवंत झलक प्रस्तुत करते हैं।

दुक्तू की सबसे बड़ी विशेषता इसकी भौगोलिक स्थिति है। गाँव के सामने हिमाच्छादित पंचाचूली शिखर आकाश को स्पर्श करते प्रतीत होते हैं, जबकि पास ही सोना और मेओला हिमनदों से निकलने वाली धाराएँ आगे चलकर धौलीगंगा का निर्माण करती हैं। सूर्योदय के समय जब पहली सुनहरी किरणें पंचाचूली की चोटियों पर पड़ती हैं, तो पूरा गाँव स्वर्णिम आभा से दमक उठता है। यही दृश्य दुक्तू को हिमालय के सबसे मनोहारी गाँवों में स्थान दिलाता है।

दोपहर के 2.30 बज रहे थे, सभी ने वापिसी का निर्णय लिया। हमारी गाड़ी में कल भी थोड़ी बहुत परेशानी थी लेकिन आज परेशानी बढ गयी थी। गाड़ी थोड़ी दूर चलती जैसे ही एक्‍सीलरेट करते, गाड़ी की पावर खत्‍म, गाड़ी रुक जाती थी, बंद करके दोबारा स्‍टार्ट करने पर फिर चलने लगती और यही सिलसिला शुरु हो गया, ढलान होने के कारण कम समस्‍या आयी लेकिन धारचूला पहुंचते-पहुंचते समस्‍या बढ़ने लगी, फिर भी हम चलते रहे। जैसे ही जौलजीबी पहुंचे और चढ़ाई शुरु हुई गाड़ी ने एक्‍सीलरेट करना ही बंद कर दिया, रात के 9 बज रहे थे, मैं तो सोया हुआ था, लेकिन बाद में मुझे पता लगा कि 15 किमी चढ़ने के बाद हम वापिस जौलबीबी आ गये, इतनी रात को कोई मैकेनिक मिलना भी मुश्किल था, इसलिए वहीं पर होटल लेने का फैसला लिया।

होटल संचालक को अपनी परेशानी बताया तो उसने किसी लोकल मैकेनिक को फोन लगाया। मैकेनिक ने कहा वह सुबह 5 बजे आ जायेगा, सभी ने खाना खाया और सो गये।

यात्रा का कष्‍टदायक चौथा दिन (जौलजीबी-पिथौरागढ-जौलजीबी-रानीखेत-बीरोंखाल)

सुबह 6 बजे वह लोकल मैकेनिक आया, उसने बोनट उठाकर देखा और थोड़ी देर जांचने के बाद हाथ खड़े कर दिये। उसने गाड़ी को पिथौरागढ बजरंग मोटर्स ले जाने को कहा जो महिन्‍द्रा का ऑथोराइज्‍ड सर्विस सेंटर है। हमने भी सोचा, ऑथोराइज्‍ड सर्विस सेंटर है, गाड़ी ठीक हो जायेगी, इसी उम्‍मीद में हमने 65 किमी वापिस पिथौरागढ़ जाने का फैसला किया, गाड़ी को पहले-दूसरे गियर में चलाते हुए करीब 10 बजे हम बजरंग मोटर पहुंचे।

वहां पर दिखाया तो पता लगा फिल्‍टर से इंजन में हवा ले जाने वाला पाइप फट गया है जिससे इंजन को ऑक्‍सीजन नहीं मिल पा रही है और गाड़ी रुक जाती है। उस समय खाज पर कोढ़ वाली स्थिति पैदा हो गयी, जब सर्विस सेंटर वालों ने कहा कि उनके पास इस गाड़ी (मराज़ो) का एयर पाइप नहीं है, अब क्‍या करे – अब जुगाड़ का सहारा था – मैकेनिक ने किसी तरह से टेप से पाइप को चिपकाया तो काम बन गया।

इसके बाद अज्‍जू और प्रेम ने कहा हमें तो पिछौड़ा लेना है, साथ में वह वॉशिंग मशीन का कोई पार्ट भी ढूंढ रहा था, पूछते-पूछते हम मार्केट तक पहुंचे, लेकिन वहां गाड़ी खड़ी करने की जगह नहीं थी, इसलिए हम आगे बढ़ गये लेकिन जब गाड़ी घुमाकर वापिस आये तो देखा यह तो एकतफा रास्‍ता (वन वे) है, अब क्‍या करे। पहाड़ी बाजारों में भीड़ बढ़ने के कारण सभी जगह वन वे बन गये हैं। अब हम फंस गये, 50 मीटर की दूरी के लिए हम करीब 3 किमी घूमें तब जाकर उन लोगों के पास पहुंचे।

पिथौड़ागढ़ से बाहर निकलने में हमें 1 घंटा लग गया। गाड़ी जैसे-जैसे गर्म होती गयी टेप भी उतरने लगा और जौलजीबी पहुंचते-पहुंचते हम रात वाली स्थिति में पहुंच गये थे, लेकिन हवा कम लीक हो रही थी। करीब 2 घंटे चलने के बाद टेप पूरी तरह फट गया। पहले गियर में आगे बढ़ते हुए, मैकेनिक को ढूंढते-ढूंढते हम एक जगह पहुंचे, नाम मुझे याद नहीं, वहां पर एक मैकेनिक मिला, या यूं सोच लो भगवान का दूत मिला। उसने पूरा सिस्‍टम बाहर निकाला और पाइप को ग्‍लू और सीमेंट से पूरी तरह सील कर दिया। उसने आत्‍मविश्‍वास के साथ गारंटी देते हुए कहा – सर परमानेंट जुगाड़ है, आप‍ निश्‍चिंत होकर चलाइये। हम सुबह 7 बजे से चले थे और शाम के 4 बजने वाले थे, कुछ खाया नहीं था। वहीं पर एक होटल भी था वहां पर हमने खाना खाया और आगे बढ़े करीब 6 बजे हम चैतेई में गोलू देवता मंदिर पहुंचे, गोलू देवता के दर्शन करने के पश्‍चात हमारे एक मित्र अल्‍मोड़ा में हमारी प्रतीक्षा कर रहे थे, उनसे मुलाकात करने बाद हम अब चलते गये।

आखिरी अग्नि परीक्षा

हम रात करीब 10 बजे रानीखेत पहुंचे तो वहां पर भी होटल बंद हो चुके थे, कहीं कुछ नहीं मिला। वहां से निकलते हुए हम करीब रात 12 बजे बिनसर स्‍वर्गाश्रम पहुंचे, वहां भी कुछ आयोजन चल रहा था लेकिन लंगर खत्‍म हो चुका था वे लोग भी बर्तन धो रहे थे। आधी रात को पहाड़ी सड़कों पर हम गाड़ी चलाते रहे, रात को गूगल भाई धोखा दे गया और हमारी गाड़ी गलत दिशा में चली गयी, वहां भाग्‍यवश हमें साइनबोर्ड दिख गया, वहां से वापिस गाड़ी घुमायी और साइनबोर्ड की दिशा में बढ़ने लगे लेकिन गूगल हमें रास्‍ता खत्‍म होने का संकेत दे रहा था। हम इस रास्‍ते पर पिछली बार भी आये थे लेकिन रात अधिक होने के कारण ठीक से पता नहीं लगा। खैर, हमने गूगल मैप को साइड किया और आगे बढ़ने लगे, कुछ ही देर में हम भिक्‍यासैण पहुंच गये और जैनल होते हुए सुबह करीब 4 बजे लगभग 22 घंटे की लगातार यातनाओं भरी यात्रा के बाद सकुशल घर पहुंच गये और सबसे बड़ी बात हमारी गाड़ी ने भी साथ नहीं छोड़ा। इस यात्रा का हासिल तनाव, थकान और असुरक्षा के अलावा कुछ भी नहीं निकला। पूरा ट्रिप बहुत ही तनावपूर्ण, असुरक्षित और परेशानी भरा रहा।

बागेश्वर से पंचाचूली ट्रेक की यात्रा-योजना

बागेश्वर से पंचाचूली बेस कैंप की यात्रा पूर्वी कुमाऊँ के खूबसूरत पर्वतीय मार्गों से होकर गुजरती है। सामान्यतः यात्रा बागेश्वर → अल्मोड़ा → पिथौरागढ़ → धारचूला → तवाघाट → दारमा घाटी → दुक्तू/दांतू तक सड़क मार्ग से पूरी होती है, जिसके बाद पंचाचूली जीरो प्‍वाइंट तक लगभग 4–5 किलोमीटर की पैदल चढ़ाई करनी होती है। यदि आप अपनी गाड़ी से यात्रा कर रहे हैं, तो 3 से 4 दिनों में आराम से यह सफर पूरा किया जा सकता है—

  • पहला दिन – बागेश्वर से धारचूला,
  • दूसरा दिन – दारमा घाटी के दुक्तू या दांतू गाँव तक,
  • तीसरे दिन – तड़के पंचाचूली बेस कैंप की ट्रेकिंग और शाम तक वापसी।
  • वहीं पारंपरिक ट्रेक मार्ग (सोबला–दार–नागलिंग–बालिंग–दुक्तू) से जाने पर – 7–9 दिन

सबसे महत्‍वपूर्ण – कब जाएँ?

पंचाचूली बेस कैंप जाने का सबसे उपयुक्त समय अप्रैल से जून और सितंबर से अक्टूबर माना जाता है। अप्रैल–जून में मौसम सुहावना रहता है, घाटी जंगली फूलों से खिल उठती है और पंचाचूली की बर्फीली चोटियाँ नीले आसमान के बीच बेहद स्पष्ट दिखाई देती हैं। वहीं मानसून के बाद सितंबर–अक्टूबर का समय फोटोग्राफी और साफ़ हिमालयी दृश्यों के लिए सबसे शानदार माना जाता है। हालांकि जुलाई–अगस्त में भूस्खलन और फिसलन के कारण यात्रा से बचना चाहिए, जबकि दिसंबर से फरवरी के दौरान भारी बर्फबारी के कारण मार्ग अक्सर बंद रहता है।

इसलिए जब घूमने निकले तो तीन बातों को हमेशा ध्‍यान रखें:-

  1. यात्रा की योजना अच्‍छे से बनायें, अपने बेस प्‍वाइंट पर समय से पहुंचे ताकि रहने की अच्‍छी और सस्‍ती जगह मिल सके। शहरों में चलने वाले वाहन दुर्गम पहाड़ों के लिए उपयुक्‍त नहीं होते हैं इसलिए जहां तक हो सके पब्लिक ट्रांसपोर्ट से यात्रा करें अन्‍यथा ऊंची ग्राउंड क्‍लेरेंस वाले और रियर व्‍हील ड्राइव या फोर व्‍हील ड्राइव वाहन ले जायें। स्‍कूटर ले जाने से पहले सड़कों की जानकारी लेना न भूलें वरना अनुभव खतरनाक हो सकता है।
  2. शहर की आदतें शहर में छोड़कर जायें और स्‍थानीय भोजन का आनन्‍द उठायें। लग्‍जरी की अपेक्षा न करें, सादा खाना खायें जिससे बीमार पड़ने की संभावना न हो।
  3. जल्‍दबाजी न करें, यदि आप घूमने निकले हैं तो पूरा आनंद उठायें, आसपास की जगहों को देखें और अच्‍छी यादें वापिस लेकर आयें शायद आपको बाद में अवसर मिला या नहीं।

यदि आप ट्रेक से संबंधित कोई जानकारी चाहते हैं तो मुझे ईमेल कर सकते हैं – rawat.yash@gmail.com

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